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Friday, 23 October 2015

इक चुप -सी ख़ामोशी

इक चुप -सी ख़ामोशी
चुभती है दिन रात
चेहरे पे इक गहरी उदासी
छायी रहती है दिन -रात
अब चले भी आओ
मेरे दोस्त !
ये तरसी निगाहें
तुम्हारा रस्ता -
तकती हैं दिन -रात ..........


- सालिहा मंसूरी

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