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Sunday, 9 October 2016

सोचती हूँ इक रोज

सोचती हूँ इक रोज
तुमसे मिलकर,
तुम्हें सब कुछ बता दूँ
तुम्हें बता दूँ- 

कि मैं बेवफा नहीं
बस ! इतना समझ लो
कुछ मजबूरियां भी थीं
कुछ बंदिशें भी थीं
जिन्होंने हम- दोनों को
न चाहते हुए भी
इक- दूजे से जुदा क्र दिया .....

सालिहा मंसूरी
23.0715

9:35 am 

3 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 10 अक्टूबर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

savan kumar said...

सुन्दर शब्द रचना

savan kumar said...

Bahut sundar

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