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Tuesday, 1 November 2016

हर-सुबह इसी उम्मीद से

हर-सुबह इसी उम्मीद से 
उठती हूँ कि कभी न कभी 
इक न इक दिन वो सुबह भी 
जरूर आएगी जब तुम मेरा 
हाँथ अपने हाँथों में थामकर 

मुझे इन खामोशियों के अंधेरों 
से खींच कर उन राहों में 
ले जाओगे जहाँ उजाले 
खुली बाहों से मेरा 
इस्तक़बाल करेंगे ........... 

सालिहा मंसूरी -

20.08.15  9;48 pm 

1 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 01 नवम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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