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Tuesday, 27 December 2016

अब तन्हा कटती नहीं

अब तन्हा कटती नहीं
ये ज़िन्दगी बिन तुम्हारे
किसे जिऊँ इन ग़मों के सहारे
क़तरा- क़तरा पिघलती हूँ
दिन-रात , इन
खामोशियों के अंधेरों में
कभी तो ले आओ
सहर की धूप
इस घर के अँधेरे में ....


सालिहा मंसूरी  

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