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Sunday, 15 January 2017

इक वादा हर रोज

इक वादा हर रोज
खुद से करती हूँ
और उस वादे को
हर रोज तोड़ भी देती हूँ

फिर अगले ही पल
खुद से वही वादा करती हूँ
और अगले ही पल
फिर उसे तोड़ देती हूँ
और ये वादों को करने
और तोड़ने का सिलसिला

हर रोज यूँ ही चलता रहता
फिर चुपके से खुद अपनी ही
हथेलियों से अपने आंसुओं को
पोंछकर खुद को ये कहकर
समझा लेती कि कभी न कभी

इक न इक दिन इन वादों
में से वो वादा भी जरूर होगा
जो अटल होगा ! अमर होगा !
और शाश्वत होगा !


सालिहा मंसूरी 

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