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Wednesday, 14 June 2017

कितने बार दिल हारा है

कितने बार दिल हारा है
कितनी ही बार हारी हूँ मैं

फिर भी हर बार संभाला है खुद को
कितनी ही बातों से समझाया है खुद को

कितनी उम्मीदें ,कितनी ख्वाहिशें ,कितने ही ख़्वाब
बस ! जलते बुझते से जुगनू की तरह

दफ्न पड़े हैं आज भी
ख़ामोशी की कब्र में ....

सालिहा मंसूरी

23.01.16  05:58 pm 

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