Google+ Badge

Wednesday, 18 January 2017

तुम आओगे इक रोज

तुम आओगे इक रोज
मेरी पलकों की मुंडेर पर
कि मैंने तारों से तुम्हारे लिए
ये पयाम भेजा है

फिर न रुकेगा ये
ख्वाबों का गुलिस्तां
कि मैंने फूलों से तुम्हारे लिए
ये सलाम भेजा है

फिर न रहेंगी ये दूरियां भी
हमारे दरमियाँ
कि मैंने तन्हाईयों से तुम्हारे लिए
ये कलाम भेजा है -------


सालिहा मंसूरी 

3 comments:

kuldeep thakur said...

दिनांक 19/01/2017 को...
आप की रचना का लिंक होगा...
पांच लिंकों का आनंद... https://www.halchalwith5links.blogspot.com पर...
आप भी इस प्रस्तुति में....
सादर आमंत्रित हैं...

savan kumar said...

सुन्दर शब्द रचना
http://savanxxx.blogspot.in

दीपक 'मशाल' said...

अच्छा लिख रही हो सालिहा, उम्र और अनुभव के इज़ाफ़े के साथ यह निश्चित रूप से दिन-बा-दिन बेहतर होगा।
कोशिश करो कि उस तबके की भी बात करो जिसके पास जुबान नहीं या जो कमज़ोर है।

Post a Comment