Google+ Badge

Tuesday, 31 January 2017

हर -सुबह तुम्हारी यादों की

हर -सुबह तुम्हारी यादों की 
बारात लेकर आती है 
और मैं तुम्हारी यादों की 
बारात के स्वागत के लिये
सूरज की इक -इक किरण को 
अपनी मुट्ठी में समेटती 

बड़ी उत्सुकता से
उस नीले आसमान की तरफ 
इक टक तकती 
तुम्हारे आने का 
इन्तजार करती रहती 
लेकिन न तुम आते 

और न तुम्हारी कोई खबर 
और फिर अचानक
धीरे -धीरे वो किरणें
मेरी मुट्ठी से 
बिखरने लगतीं .....


सालिहा मंसूरी

0 comments:

Post a Comment