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Tuesday, 21 July 2015

ऐ मेरे दोस्त

"ऐ मेरे दोस्त !
ये किस जगह ले आये हो मुझे 
जहाँ से ना ना तो ज़मी दिखती है 
ना नीले आसमान में उड़ते पंछी 
दिखती है तो सिर्फ -
वीरानगी ! तनहाइयाँ ! और खामोशियाँ !
जो रात के अँधेरे में
तकिये की ओट में 
अपने आंसू पोंछ रहीं हैं ...............

सालिहा मंसूरी -
22 .6.15 -5 :58am

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