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Monday, 17 October 2016

तुम्हें भूलना चाहा बहुत

तुम्हें भूलना चाहा बहुत 
फिर भी तुम याद रहे 
दिल को समझाया बहुत
फिर भी तुम याद रहे 
ये सांसों की डोर 

कब और कैसे 
तुमसे जुड़ गई 
मैं खुद नहीं जानती 
बस ! इतना जानती हूँ 
मेरी ज़िन्दगी तुमसे है 
मेरी बंदगी तुमसे है ...


सालिहा मंसूरी – 
05.07.15 07.45 pm 

2 comments:

Digvijay Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 18 अक्टूबर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

प्रभात said...

वाह क्या बात है !

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