Thursday, 9 February 2017

मिले थे तुम अजनबी राहों की तरह

मिले थे तुम अजनबी राहों की तरह 
और खो गए इक गुजरते राही की तरह 
मुझे देखकर ठिठके भी नहीं 
संभालना तो बहुत दूर की बात है ..... 

सालिहा मंसूरी 

09.01.16    04:08 pm

Wednesday, 8 February 2017

किनारा मिले न मिले

किनारा मिले न मिले 
फिर भी मैं चलती जाऊँगी 
मंजिल मिले न मिले 
फिर भी मैं बढ़ती जाऊँगी 
राही रुके न रुके 
फिर भी मैं संभलती जाऊँगी ...... 

सालिहा मंसूरी 

04.01.16   07:45 am

Tuesday, 7 February 2017

तेरी ज़िन्दगी की हर – इक राह आसां हो जाए

तेरी ज़िन्दगी की हर – इक राह आसां हो जाए 
तेरे सपनों का हर – इक ख्वाब पूरा हो जाए 
तेरी साँसों की डोर न तुझसे दूर हो कभी 
मेरी साँसों की डोर भी तेरी साँसों से जुड़ जाए ..... 

सालिहा मंसूरी 

02.01.16   12:45 pm

Monday, 6 February 2017

पल – दो – पल की खुशियाँ थीं वो

पल – दो – पल की खुशियाँ थीं वो 
पल – दो – पल के सपने 
आँख खुली तो , कुछ भी पास नहीं था 
बस ! थे कुछ बीते लम्हे ...... 

सालिहा मंसूरी 

02.01.16   05:22  pm

Sunday, 5 February 2017

ये सूरज , चाँद – सितारे

ये सूरज , चाँद – सितारे 
हर वक़्त रहते हैं , पास हमारे 
हम न रहेंगे , फिर भी चमकेंगे 
हर दिन – रात , साथ हमारे ......  

सालिहा मंसूरी 

01.01.16     07:07 am 

Saturday, 4 February 2017

सूने से दिन- सूनी सी रात

सूने से दिन- सूनी सी रात
फिर भी बुनते रहते हैं
इक खूबसूरत सा ख्वाब
जानते हैं कि – 

तुम नहीं मिलोगे कभी
फिर भी देते रहते हैं
खुद को कुछ उम्मीदों की आस
ठहरा हुआ है आज भी 

इस अँधेरे से घर में
तेरी यादों का वजूद
और बिखरे पड़े हैं
खामोशी में सिमटे 

कुछ अनकहे , कुछ अनसुने
अधूरे से शब्द ! 

सालिहा मंसूरी 


26.12.15 10:35  pm 

Friday, 3 February 2017

जीने नहीं देती है , हर याद तुम्हारी

जीने नहीं देती है , हर याद तुम्हारी
हँसने नहीं देती है , हर बात तुम्हारी
बस ! हर वक़्त धड़कता रहता है
दिल में नाम तुम्हारा
यही वो पल है , जिसे मैं भुला नहीं पाती ..... 


सालिहा मंसूरी

Thursday, 2 February 2017

जिसको माना था अपना

जिसको माना था अपना
वही बेगाना हुआ
जिसको चाहा था पाना
वही अफसाना हुआ 

ये तक़दीर है या
किस्मत का कोई खेल
जिस राह से गुजरो
बस ! यही इक तराना हुआ ---- 


सालिहा मंसूरी

Wednesday, 1 February 2017

तुम नहीं मिले तो क्या हुआ

तुम नहीं मिले तो क्या हुआ 
तेरे रूप में मिला मुझे आसमां
वो आसमां 
जो तेरे साये की तरह 
हर -वक़्त मेरे साथ चला 
हर -वक़्त मेरे साथ रहा 
कड़ी धूप में भी 
और अँधेरी रात में भी ..... 


सालिहा मंसूरी

Tuesday, 31 January 2017

हर -सुबह तुम्हारी यादों की

हर -सुबह तुम्हारी यादों की 
बारात लेकर आती है 
और मैं तुम्हारी यादों की 
बारात के स्वागत के लिये
सूरज की इक -इक किरण को 
अपनी मुट्ठी में समेटती 

बड़ी उत्सुकता से
उस नीले आसमान की तरफ 
इक टक तकती 
तुम्हारे आने का 
इन्तजार करती रहती 
लेकिन न तुम आते 

और न तुम्हारी कोई खबर 
और फिर अचानक
धीरे -धीरे वो किरणें
मेरी मुट्ठी से 
बिखरने लगतीं .....


सालिहा मंसूरी

Monday, 30 January 2017

बीते दिनों तुमसे बिछड़े

बीते दिनों तुमसे बिछड़े 
इक अरसा हो गया 
लेकिन हर -दिन 
हर -पल, हर- क्षण 

तुम याद आते रहे 
और धड़कते रहे 
इस धड़कन में 
इक ख्वाब की तरह 

वो ख्वाब जो कभी 
पूरा न हो सका
लेकिन उस ख्वाब को 
पूरा करने की ख्वाहिश 

आज भी बाक़ी है 
इस दिल में 
इक विशवास की 
जीत की तरह .....


सालिहा मंसूरी

Sunday, 29 January 2017

हसीं है हर शाम तेरे मैख़ाने में

हसीं है हर शाम तेरे मैख़ाने में 
जवां है हर जाम तेरे पैमाने में


सालिहा मंसूरी

Saturday, 28 January 2017

अँधेरी रात में तेरी यादों के साये हैं

अँधेरी रात में तेरी यादों के साये हैं
सुनहरी धूप में तेरी बाँहों के साये हैं 

क्या यही है तेरे प्यार का असर 
कि हर चेहरे में तेरे चेहरे के साये हैं .....


सालिहा मंसूरी

Friday, 27 January 2017

किसी भी राह से गुजरो

किसी भी राह से गुजरो 
तुम्हें अब हम न मिलेंगे 
जो सितम ढाये हैं 

तुमने मुझ पर 
उन्हें अब हम न सहेंगे ....


सालिहा मंसूरी

Thursday, 26 January 2017

उनसे बिछड़े इक जमाना हो गया

उनसे बिछड़े इक जमाना हो गया 
वो क्या मिले कि वो पल 
इक फ़साना बन गया ..... 


सालिहा मंसूरी

Wednesday, 25 January 2017

सारी दुनिया बेगानी

सारी दुनिया बेगानी 
बस !तुम मेरे अपने हो 

सारे लोग हैं अनजाने 
बस ! तुम जाने पहचाने हो .....


सालिहा मंसूरी

Tuesday, 24 January 2017

खो गया वो सितारा इस जहाँ में-

खो गया वो सितारा इस जहाँ में-
अब न चमकेगा वो दोबारा इस जहाँ में ....


सालिहा मंसूरी

Monday, 23 January 2017

कितने -ही शब्द गूंजते रहे

कितने -ही शब्द गूंजते रहे 
इन कानों में 
कितने -ही शब्द धड़कते रहे 
इस धड़कन में

कितने -ही शब्द उलझते रहे
इन साँसों में 
कितने -ही शब्द सुलगते रहे 
इन आँखों में ...... 


सालिहा मंसूरी

Sunday, 22 January 2017

आज तक कुछ न माँगा ख़ुदा से

आज तक कुछ न माँगा ख़ुदा से 
आज माँगा है तेरा साथ ख़ुदा से ....


सालिहा मंसूरी

Saturday, 21 January 2017

इन तन्हाइयों की राहों में

इन तन्हाइयों की राहों में 
अकेली ही चलती रहती हूँ 

हर चेहरे में,मैं
तेरे चेहरे को ही 
ढूंढती रहती हूँ ....


सालिहा मंसूरी

Friday, 20 January 2017

न ये ज़मी तुम्हारी है

न ये ज़मी तुम्हारी है
न वो आसमां तुम्हारा है 
न ये घर तुम्हारा है 
न ये दुनियाँ तुम्हारी है 

इस दुनियाँ से दूर 
उन सितारों के पास 
तुम्हें भी इक रोज जाना है .....


सालिहा मंसूरी

Thursday, 19 January 2017

फिजा में रंग कितने हों

फिजा में रंग कितने हों 
लेकिन मेरी हर शाम तुमसे है

चमन में फूल कितने हों 
लेकिन मेरी हर सुबहो तुमसे है ....

सालिहा मंसूरी

Wednesday, 18 January 2017

तुम आओगे इक रोज

तुम आओगे इक रोज
मेरी पलकों की मुंडेर पर
कि मैंने तारों से तुम्हारे लिए
ये पयाम भेजा है

फिर न रुकेगा ये
ख्वाबों का गुलिस्तां
कि मैंने फूलों से तुम्हारे लिए
ये सलाम भेजा है

फिर न रहेंगी ये दूरियां भी
हमारे दरमियाँ
कि मैंने तन्हाईयों से तुम्हारे लिए
ये कलाम भेजा है -------


सालिहा मंसूरी 

Tuesday, 17 January 2017

अंधेरों में तेरे होने का एहसास है

अंधेरों में तेरे होने का एहसास है 
सितारों में तेरे होने का ख्वाब है 

तुम खुश रहो सलामत रहो 
ये मेरी हर धड़कन की आवाज़ है .....


सालिहा मंसूरी

Monday, 16 January 2017

कुछ ख़ामोशियां हैं

कुछ ख़ामोशियां हैं 
तुम्हारे नाम कीं
कुछ उदासियाँ हैं 

तुम्हारे नाम कीं 
जो आज इन पलकों 
पर बिखरी पड़ीं हैं ........ 


सालिहा मंसूरी

Sunday, 15 January 2017

इक वादा हर रोज

इक वादा हर रोज
खुद से करती हूँ
और उस वादे को
हर रोज तोड़ भी देती हूँ

फिर अगले ही पल
खुद से वही वादा करती हूँ
और अगले ही पल
फिर उसे तोड़ देती हूँ
और ये वादों को करने
और तोड़ने का सिलसिला

हर रोज यूँ ही चलता रहता
फिर चुपके से खुद अपनी ही
हथेलियों से अपने आंसुओं को
पोंछकर खुद को ये कहकर
समझा लेती कि कभी न कभी

इक न इक दिन इन वादों
में से वो वादा भी जरूर होगा
जो अटल होगा ! अमर होगा !
और शाश्वत होगा !


सालिहा मंसूरी 

Saturday, 14 January 2017

न मैं बदली हूँ

न मैं बदली हूँ
न ये आईने बदले हैं 

बस ! कुछ रिश्तों के 
मायने बदले हैं .....


सालिहा मंसूरी

Friday, 13 January 2017

कुछ पन्नों को

कुछ पन्नों को 
पलटती रही आज 
कुछ तुम्हारी यादों के

कुछ तुम्हारी बातों के 
कुछ तुम्हारे वादों के 
और कुछ अपने -
अरमानों के ....... 


सालिहा मंसूरी

Thursday, 12 January 2017

राख हो गए वो सपने

राख हो गए वो सपने
जो देखे थे कभी मैंने
तुम्हारी पलकों के तले
चुप है वो राख आज भी
लेकिन उस चुप सी राख में 

शोलों की ज्वाला
सुलग रही है आज भी
इक चिंगारी लगा कर देखो
तुम्हें उस चुप सी राख में
शोलों की ज्वाला भड़कती
हुई नज़र आएगी -----


सालिहा मंसूरी 

Wednesday, 11 January 2017

बिछड़े साथी

बिछड़े साथी फिर नहीं मिलते -
टूटे आईने भी तो फिर नहीं जुड़ते ........ 



सालिहा मंसूरी  

Tuesday, 10 January 2017

वो शब्द आज अचानक ही

वो शब्द आज अचानक ही
जुबां पर आ गया
जिस शब्द से तुम
अक्सर मुझे पुकारा करते थे
और मैं 

तुम्हारी आवाज़ की
मधुरता से भरे हुए
उस शब्द को सुनने के लिए
अक्सर व्याकुल हो उठती
मेरी व्याकुलता उन दिनों
और अधिक व्याकुल हो उठती
जब – जब मुझे उस शब्द की
गूँज सुनायी देती – 

मेरी व्याकुलता आज भी
व्याकुल है , तुम्हारी आवाज़
की मधुरता से भरे हुए
उस शब्द को सुनने के लिए ------- 


सालिहा मंसूरी 

Monday, 9 January 2017

तुम्हें तुम्हें जी भर कर देखूँ

जी करता है
तुम्हें तुम्हें जी भर कर देखूँ
उन तारों के साए में
जो दिखने में बहुत दूर सही
लेकिन मेरे दिल के बहुत पास हैं ------ 


सालिहा मंसूरी 

Sunday, 8 January 2017

नहीं जानती कि तुम कौन हो

नहीं जानती कि तुम कौन हो
कहाँ रहते हो
और क्या नाम है
लेकिन फिर भी
न जाने क्यूँ ये दिल 

सिर्फ तुम्हारा
इंतज़ार करता है
और ये आँखें उन
चमकते तारों में
तुम्हारा अक्स ढूंढती रहती हैं -----


सालिहा मंसूरी